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Thursday, 29 July 2021

अद्भुत नगरी काशी

 

मैं सुरसरिता गंगा की सखी,
शिव अविनाशी की दासी हूँ।
         मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।


समस्त शास्त्र सारे पुराण 
मेरा गुणगान सुनाते हैं।
कवि-कोविद और ऋषि-मुनि 
सब नित मेरी गाथा गाते हैं।
मैं विश्व प्रसिद्ध प्राचीन पुरी, 
समरसता की अभिलाषी हूँ।
          मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

उत्तरवाहिनी माँ गंगा का 
निर्मल जल कल-कल बहता है।
मेरा कण-कण सत्य सनातन 
कथा धर्म की कहता है।
शिव के त्रिशूल पर बसी हुई, 
मैं अजर अमर अविनाशी हूँ।
           मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

गुरु हैं सब राजा हैं यहाँ, 
कोई भी रंक न अज्ञानी।
लोग यहाँ हैं सहज सरल,
सदा पराजित अभिमानी।
यूँ तो स्वभाव से हूँ अक्खड़ 
पर नर्म हृदय मृदुभाषी हूँ।
           मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

बिस्मिल्लाह की शहनाई यहाँ 
गिरिजा देवी की ठुमरी है।
हरि की बंशी, रवि का सितार, 
चैती है, फाग है, कजरी है।
प्रिय मधुर सब राग मुझे, 
संगीत सुधा की प्यासी हूँ।
            मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

साहित्य, कला और धर्म का 
शाश्वत संगम है मेरी धरती।
मोक्षदायिनी परमधाम, मैं 
पतितों के पातक हरती।
मंदिर-मंदिर, मैं घाट-घाट 
सूर्योदय की आभा-सी हूँ।
       मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

भैरव जी है कोतवाल यहाँ, 
रक्षा का भार उठाते हैं।
माँ अन्नपूर्णा का दिया हुआ 
ही लोग यहाँ पर खाते हैं।
नाथ हैं मेरे विश्वनाथ 
उनके पद तल की वासी हूँ।
             मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

मैं सुरसरिता गंगा की सखी,
शिव अविनाशी की दासी हूँ।
           मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।
         - विकास पाण्डेय 'विदीप्त'