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Saturday, 31 August 2024

हिंदी फ़िल्में और भारतीय रेल

हिंदी फिल्मों और भारतीय रेल का नाता बहुत पुराना है। इस आलेख में हम इसी संबंध को समझने करने का प्रयास करेंगे। भारतीय रेल यातायात का साधन मात्र नहीं है, यह स्थिरता के अंधकार में गतिशीलता का प्रकाश है, यह भारत की जनता का विश्वास है, भारतीय रेल है तो चतुर्दिक विकास है।  हमारी यह रेल  जीवन के हर क्षेत्र से गहराई से जुड़ी है - साहित्य से, समाज से, अर्थव्यवस्था से,  संगीत से  और फिल्मों से भी। इस दृष्टि से हमारा विषय हिंदी फिल्म और भारतीय रेल अति महत्वपूर्ण बन जाता है। यदि फिल्में समाज का दर्पण है तो रेल देश की धड़कन है।
     हिंदी फिल्मों और भारतीय रेल ने एक दूसरे को बहुत हद तक प्रभावित किया है।  फिल्मों ने  भारतीय रेल की सहायता से स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक ताना-बाना, आजीविका कमाने की जद्दोजहद और  प्रेम जैसे विषयों का रूपहला विश्लेषण किया है। कुछ फिल्मों ने दुर्घटनाओं की त्रासदी को भी बखूबी चित्रित किया है।  
    '23 मार्च 1931 शाहिद','द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह' आदि फिल्मों में चंपारण सत्याग्रह, काकोरी कांड, नेताजी की लाहौर यात्रा जैसी घटनाओं को भारतीय रेल की सहायता से बहुत ही जीवंत रूप में पर्दे पर उतरा  गया है। पिंजर नाम की फिल्म भारत विभाजन की त्रासदी इस तरह परिभाषित करती है कि दर्शकों की आँखों से झर-झर आँसू गिरते हैं।
    फिल्म 1936 की फिल्म 'अछूत कन्या' और 1955 की 'रेलवे प्लेटफार्म' नमक चलचित्रों ने देश की सामाजिक बुनावट को रेल के माध्यम से ही चित्रित किया है।  अछूत कन्या फिल्म में प्रताप और कस्तूरी के किरदार क्रमशः अशोक कुमार और देविका रानी ने निभाया है।  ब्राह्मण युवक प्रताप और तथाकथित अछूत युवती कस्तूरी की प्रेम कथा का अंत रेल मार्ग पर स्थित एक फाटक के निकट होता है जहाँ कस्तूरी अपने सुहाग और प्रेम दोनों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देती है। 'रेलवे प्लेटफार्म' फ़िल्म में बाढ़ की विभीषिका में फँसी रेलगाड़ी की कथा है। इस चलचित्र में प्रथम श्रेणी कोच में यात्रा कर रही एक राजकुमारी को द्वितीय श्रेणी के एक युवक यात्री में अपना नायक दिखाई देता है। इस फिल्म ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि संकट व त्रासदी झेलने की क्षमता यथाचित्रित द्वितीय श्रेणी के लोगों में अपेक्षाकृत अधिक होती है।
   'स्लमडॉग मिलेनियर' फिल्म का जमाल, सलीम और लतिका हम सबको प्रायः याद आते हैं।  जमाल और उसका भाई  छोटे-मोटे सामान बेचते हुए या छोटी-छोटी चोरियाँ करते हुए उन लाखों ज़िन्दगियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो रेलवे स्टेशनों पर या उसके आसपास फल-फूल और बढ़ रही हैं। फिल्म कुली का एक गीत तो भारतीय रेल का दर्शनशास्त्र बनकर उभरता है। नायक गाता है- "सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं" जैसे यह भारत की रेल स्वयं गा रही हो या कोई रेलवे स्टेशन आलाप लगा रहा हो- "लोग आते हैं लोग जाते हैं हम यहीं पर खड़े रह जाते हैं"।
प्रेम की व्यग्रता, आकुलता और तीव्रता को प्रकट करने के लिए अनेक फिल्मकारों ने रेल की  गति का सहारा लिया है।  एक लोकप्रिय हिंदी फिल्म का एक दृश्य काफी यादगार है जिसमें रेल में चढ़े नायक राज के पीछे भागते हुए पहुंचती है नायिका सिमरन।  प्रेम मिलन का यह दृश्य अमिट प्रभाव छोड़ता है। 'चेन्नई एक्सप्रेस' फिल्म में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच का प्रेम, रेल के एक डिब्बे में ही परवान चढ़ता है। जिस प्रकार यह फिल्म उत्तर और दक्षिण के बीच भाषाई पुल का कार्य करती है ठीक उसी प्रकार भारतीय रेल देश की एकता के सूत्र  का कार्य करती है। 'दिल से', 'वीर जारा'  'गदर' आदि अनेक फिल्में हैं जिनमें रेलगाड़ी ने ही प्यार को परिणति तक पहुँचाया है। आराधना फिल्म की रेल की छुक-छुक करती सँकरे रेल मार्ग की गाड़ी और सुमधुर प्रेममय संगीत सभी को याद  होगा संभवतः।
  कई हिंदी चलचित्रों ने भारतीय रेल को खतरों से आगाह किया है। द बर्निंग ट्रेन एक कालजयी फिल्म है। यह आग के खतरों से रेल को चेताती है। विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डालती यह फिल्म प्रबंधन तंत्र को चेतावनी देती है कि रेल को आग जैसी दुर्घटनाओं से कितनी बड़ी विभीषिका झेलनी पड़ सकती है।  शोले और प्लेयर्स जैसी फ़िल्में हमें लुटेरों की चुनौती से सावधान करती हैं। अर्थात, हिंदी फिल्मों में रेल की सुरक्षा और संरक्षा जैसे मुद्दों को न केवल उठाया है  बल्कि उनके  समाधान खोजने का प्रयास भी किया है।
   फिल्मों की शूटिंग रेल के राजस्व अर्जन का एक स्रोत है।  पर पिछले वर्षों में रेल के साथ फ़िल्म निर्माण के शुल्क में भारी वृद्धि की गई है। इससे आशंका बनती है कि कहीं फिल्मों और रेल का यह साहचर्य टूट न जाए। हमें इस गठजोड़ को बनाए रखने का प्रयास करना होगा। 
  अंत में, इस आलेख में यह लेखक तूफान मेल फिल्म के गीत की कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना चाहता है जो जीवन दर्शन को परिभाषित करती हैं। 

दुनिया यह दुनिया तूफान मेल!
इसके पहिए जोर से चलते 
और अपना रास्ता तय करते।  
सयाने इससे काम पे निकलें 
बच्चे समझें खेल।
तूफान मेल! तूफान मेल!!
           -विकास विदीप्त

Friday, 28 July 2023

पर्यावरण की चुनौतियाँ और हम

 चरक संहिता में जनपदोध्वंस नामक एक अध्याय है जिसमें पर्यावरण पर चर्चा की गई है। इस अध्याय का निहितार्थ है कि जिस देश और काल का पर्यावरण प्रदूषित हो गया हो उसका परित्याग कर देना चाहिए क्योंकि उसका विध्वंस सन्निकट होता है। यह उल्लेख करने का  उद्देश्य यह बताना है कि प्रदूषण ही पर्यावरण की सर्वकालिक चुनौती रहा है। यह एक नकारात्मक चुनौती है। साथ ही कुछ संसाधनों और पदार्थों की दुर्लभता तथा जैव प्रजातियों की विलुप्तता भी पर्यावरण की प्रमुख नकारात्मक चुनौतियां हैं। पर्यावरण की कुछ सकारात्मक चुनौतियां भी हमारे समक्ष विद्यमान हैं, जैसे- अधिकाधिक वृक्षारोपण करना, वनों का विध्वंस रोकना, जन जागरूकता में वृद्धि और शिक्षा द्वारा पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना, इत्यादि।

हम पर्यावरण की चुनौतियां के मात्रात्मक पक्ष पर एक दृष्टि डालते हैं- 

1) औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक कार्बन उत्सर्जन द्विगुणित होकर 421 कण प्रति दस लाख तक पहुँच  गया है। इससे वायुमंडलीय ऊष्मीकरण तीव्र हो रहा है। पिछले सौ वर्षो में पृथ्वी की संपूर्ण सतह का तापमान 1 डिग्री फारेनहाइट बढ़ गया है। कार्बन उत्सर्जन ही ओजोन रिक्तिकरण की समस्या के लिए उत्तरदायी है। 

 2) निर्वनीकरण और  औद्योगिक अच्छादन के कारण वन्य जीवों  का प्राकृतिक आवास प्रभावित हुआ है। वनों के आसपास की बस्तियों पर उनके आक्रमण की घटनाओं में वृद्धि हुई है। बिहार के बाल्मीकीनगर बाघ अभयारण्य,  उत्तराखंड के पौड़ी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश के बहराइच क्षेत्र के साथ ही अन्य प्रान्तों से प्रायः ऐसी खबरें आती हैं। वनों  के निकट स्थित कई क्षेत्रों में मांसाहारी जीवों का आक्रमण होने की  खबरें मिलती रहती हैं। 

3) हमारे खान-पान की आदतें अव्यवस्थित और प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध होती जा रही हैं। हमारी अस्त व्यस्त जीवन शैली, साफ सफाई के प्रति हमारी असंवेदनशीलता, सुख सुविधाओं के दासत्व के कारण भी अनेक चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं। चेचक, प्लेग, मलेरिया, टाइफाइड और डेंगी को झेलते हुए हम कोविड के दौर में पहुँच चुके हैं।

4) अंधाधुंध विकास की अंतर्राष्ट्रीय होड़ ने अनेक हानिकारक गैसों और रसायनों के उत्सर्जन को तीव्र किया है जिससे जल और वायु प्रदूषित हो रहे हैं, पेयजल की कमी हो रही है। क्लोरो फ़्लोरो कार्बन, नाईट्रस ऑक्साइड, हाईड्रोजन सल्फाइड आदि ऐसी ही गैसें हैं।

5) 'क्लब ऑफ रोम' का एक प्रपत्र है  जो  1871 से 1971 के बीच पर्यावरण में बदलाव की प्रवृत्ति के विश्लेषण  पर आधारित है । इसमें  कहा गया है कि 2071 तक यह धरती मानव सभ्यता के लिए अनुपयोगी हो  जाएगी। यदि हम अभी से नहीं चेते तो आगे बहुत कठिन समय आने वाला है। हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा। 

 पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए हमें क्रांतिकारी प्रयास करने की आवश्यकता है। इसके प्रति हमारे आवश्यक कर्तव्यों को 4 'स' के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता है- 'समझ', 'सहभागिता', 'सशक्तिकरण' और 'स्वत्व'।

  'समझ' से  तात्पर्य व्यक्ति और समाज में पर्यावरण की समझ को व्यापक बनाने से है। पर्यावरण शिक्षा का प्रसार करके हम इसके प्रति संवेदना में वृद्धि कर सकते हैं।  'सहभागिता' का निहितार्थ है पर्यावरण संरक्षण में जनभागीदारी को बढ़ाना। इसी प्रकार सशक्तिकरण का अर्थ है-  ज्ञान के द्वारा व्यक्ति को और अनुसंधान के द्वारा प्रौद्योगिकी को  इतना सशक्त बनाया जाए कि पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे।  चौथा 'स' स्वत्व को इंगित करता है। हमारे शरीर के पंच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हमारे अंदर के अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोषों को प्रभावित करते हैं। पर्यावरण को शुद्ध रखकर ही हम अपने शरीर के भीतर के  इन कोषों को शुद्ध रख सकते हैं और आत्मा को स्वस्थ रख सकते हैं। अतः हमें  क्षिति, जल, पावक, अनल और समीर को शुद्धतम रूप में रखना ही होगा और इस पर अपना स्वत्व बनाए रखना होगा।  

 हम व्यक्तिगत तौर पर ,दैनिक क्रियाकलापों और सामान्य व्यवहार में  सजगता लाकर पर्यावरण सुरक्षा में अपनी सहभागिता बढ़ा सकते हैं। विद्युत उपकरणो का यथोचित उपयोग, जल की बरबादी को रोकना, अपने परिवार में जल और वायु के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना, पौधे लगाना और दूसरों को इसके लिए प्रेरित करना, आदि कार्य हमें अपनी जीवन शैली में समाहित करने होंगे।

  पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षा के लिए हमने कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं। पृथ्वी सम्मेलन, क्योटो प्रस्ताव, बाली कार्य योजना, जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी कार्यबल आदि के माध्यम से हमने पर्यावरण की अक्षुण्णता को बनाए रखने का प्रयास किया है। हमें व्यक्तिगत तौर पर भी बड़ा प्रयास करना होगा, अपना शत प्रतिशत योगदान देना होगा।।  इस आलेख का समापन विकास विदीप्त की दो पंक्तियों से करना उचित है-

पेड़ बूढ़ा हुआ है तो क्या हो गया

            छाँव इसकी घनी है घनी रहने दो।

छाँटो मत शाखें तुम निर्दयी मत बनो

              जितनी है रोशनी, रोशनी रहने दो।

                   *****                                                            - विकास पाण्डेय

Tuesday, 7 March 2023

होली गीत

 ~:होली:~


होली हुई सतरंगी सखी!

                 मेरी होली हुई सतरंगी।

श्याम-हरी संग रंगी सखी!

                 मेरी होली हुई सतरंगी। 


कमल-नयन-रतनार निराले।

सो हैं  कृष्ण  पीताम्बर  डाले। 

                        देख छटा बहुरंगी! 

देख छटा बहुरंगी सखी!

                   मेरी होली हुई सतरंगी। 


लोहित अधर, गाल पर लाली। 

सुन वंशी  की   धुन  मतवाली। 

                    होली   मची  अंतरंगी! 

होली मची अन्तरंगी सखी! 

                   मेरी होली हुई सतरंगी। 


प्रेम  रंग भर भर कर डारी।

भींजत  गोवर्धन  गिरधारी। 

                           जगत रंग ना रंगी! 

जगत रंग ना रंगी सखी! 

                    मेरी होली हुई सतरंगी।

                               - विकास 'विदीप्त'

Monday, 9 January 2023

वह धीरे धीरे मरने लगता है

 “ वह धीरे धीरे मरने लगता है ”

                     -  मार्था मेदिरोस 

                      अनुवाद- विकास 'विदीप्त' 


वह धीरे धीरे मरने लगता है

जो करता नहीं विचारों का आदान प्रदान। 

जो  अपने अंतर्विरोधों का सामना नहीं करता। 


जो गुलाम है अपनी आदतों का 

जो जीता है एक ही दिनचर्या

जो  बदलता नहीं अपनी रफ़्तार

जो उठाता नहीं जोखिम 

जो पहनता नहीं अलग रंगों के वस्त्र

जो नहीं करता बात अपरिचितों से 

वह धीरे धीरे मरने लगता है । 


वह स्त्री या वह पुरुष

जो दूर भागता है अपने जूनून से।

जो भावनाओं की गर्मजोशी से अधिक

'मैं' को महत्व देता है। 

वे भावनाएं जो 

वापस ला सकती हैं 

किन्हीं आँखों को चमक,

उबासी को मुस्कान में बदल सकती हैं

जोड़ सकती हैं टूटे हुए हृदय को। 


जिसे श्वेत से अधिक स्याह पसंद है

वह धीरे धीरे मरने लगता है । 


जो नहीं रखता कभी भी 

चीजों को अस्त व्यस्त 

जो असंतुष्ट रहता है अपने कार्य से।

अपना लक्ष्य पाने के लिए 

जो नहीं लेता जोखिम 

अनिश्चित के लिए निश्चित को छोड़ने का। 


जो जीवन में कम से कम एक बार 

अवहेलना नहीं करता 

किसी उचित सलाह की

वह धीरे धीरे मरने लगता है l 


जो करता नहीं यात्रा 

जो कुछ पढता नहीं

जो नहीं सुनता संगीत 

वह स्त्री जो नहीं पाती खुद में कोई लावण्य 

वह पुरुष जो नहीं देख पाता स्वयं में आकर्षण 

वह धीरे धीरे मरने लगता है l 


वह, जिसने नष्ट कर लिया है आत्मसम्मान

जो नहीं ले पाता किसी से सहायता

जो अविरल वृष्टि को अपना दुर्भाग्य मान कर

गँवा देता है पूरा दिन l

वह धीरे धीरे मरने लगता है l 


वह स्त्री या पुरुष 

जो रोक देता है कोई कार्य 

शुरू करने के पूर्व ही ।

जो अज्ञानता मिटाने के लिए 

प्रश्न नहीं पूछ पाता। 

वह स्त्री या पुरुष 

जो पूछने पर भी नहीं देता वह जवाब 

जो उसे निश्चय ही ज्ञात है l

वह धीरे धीरे मरने लगता है l 


आइये! किश्तों में आनेवाली मृत्यु को 

हम दूर भगाएँ।

याद रहे! 

जीवित रहने के लिए 

केवल सांस लेते रहने से ज्यादा बड़े 

प्रयास की आवश्यकता है l 


केवल प्रबल धैर्य से प्राप्त होगा भव्य हर्ष l 


             - मार्था मेदिरोस

          (अनुवाद- विकास विदीप्त)

Thursday, 29 July 2021

अद्भुत नगरी काशी

 

मैं सुरसरिता गंगा की सखी,
शिव अविनाशी की दासी हूँ।
         मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।


समस्त शास्त्र सारे पुराण 
मेरा गुणगान सुनाते हैं।
कवि-कोविद और ऋषि-मुनि 
सब नित मेरी गाथा गाते हैं।
मैं विश्व प्रसिद्ध प्राचीन पुरी, 
समरसता की अभिलाषी हूँ।
          मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

उत्तरवाहिनी माँ गंगा का 
निर्मल जल कल-कल बहता है।
मेरा कण-कण सत्य सनातन 
कथा धर्म की कहता है।
शिव के त्रिशूल पर बसी हुई, 
मैं अजर अमर अविनाशी हूँ।
           मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

गुरु हैं सब राजा हैं यहाँ, 
कोई भी रंक न अज्ञानी।
लोग यहाँ हैं सहज सरल,
सदा पराजित अभिमानी।
यूँ तो स्वभाव से हूँ अक्खड़ 
पर नर्म हृदय मृदुभाषी हूँ।
           मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

बिस्मिल्लाह की शहनाई यहाँ 
गिरिजा देवी की ठुमरी है।
हरि की बंशी, रवि का सितार, 
चैती है, फाग है, कजरी है।
प्रिय मधुर सब राग मुझे, 
संगीत सुधा की प्यासी हूँ।
            मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

साहित्य, कला और धर्म का 
शाश्वत संगम है मेरी धरती।
मोक्षदायिनी परमधाम, मैं 
पतितों के पातक हरती।
मंदिर-मंदिर, मैं घाट-घाट 
सूर्योदय की आभा-सी हूँ।
       मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

भैरव जी है कोतवाल यहाँ, 
रक्षा का भार उठाते हैं।
माँ अन्नपूर्णा का दिया हुआ 
ही लोग यहाँ पर खाते हैं।
नाथ हैं मेरे विश्वनाथ 
उनके पद तल की वासी हूँ।
             मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।

मैं सुरसरिता गंगा की सखी,
शिव अविनाशी की दासी हूँ।
           मैं अद्भुत नगरी काशी हूँ।
         - विकास पाण्डेय 'विदीप्त'

Wednesday, 7 April 2021

एक भारत श्रेष्ठ भारत


एक भारत श्रेष्ठ भारत 
  ज्ञान सिंधु विवेक भारत।
    विश्व के मानस पटल पर 
      है सुनहरा लेख भारत।

अनेकता में एकता का
   दीप निशदिन जल रहा
      विशिष्ट शक्ति संपदा का
        स्वर्ण पक्षी पल रहा ।
चिर सनातन काल से
    समृद्धि का अतिरेक भारत
      विश्व के मानस पटल पर
        है सुनहरा लेख भारत।

भगत का, आजाद का
    सुभाष चंद्र बोस का
     'लाल' 'बाल' औ' पाल का
        स्वराज्य के उद्घोष का।
स्वतंत्रता की राह में है
   क्रांति का अभिषेक भारत
     विश्व के मानस पटल पर
       है सुनहरा लेख भारत।

गीता की गुरु ग्रंथ की
  वेद और पुराण की
    बुध की महावीर की
     अवेस्ता और कुरान की। 
हर धर्म की सुरभित पवन
   पावन बना परिवेश भारत ।
     विश्व के मानस पटल पर
       है सुनहरा लेख भारत।

गांधी का सत्याग्रह
  अंबेडकर की कृतियां
    कलाम और गफ्फार की
      समभाव वाली नीतियां
महानतम विभूतियों का
  विश्व में उल्लेख भारत।
    विश्व के मानस पटल पर
      है सुनहरा लेख भारत।

राज्य का और क्षेत्र का
  जो भूल कर विभेद हम
    भाषा और प्रदेश का
      करें नहीं जो भेद हम ।
विश्व गुरु फिर से बनेगा
  श्रेष्ठ निर्मल नेक भारत।
    विश्व के मानस पटल पर
        है सुनहरा लेख भारत।

एक भारत श्रेष्ठ भारत
  ज्ञान सिंधु विवेक भारत।
    विश्व के मानस पटल पर
      है सुनहरा लेख भारत।
                 * * *

Tuesday, 9 October 2018

भूमंडलीकरण के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष



 भूमंडलीकरण आज के युग का एक जाना पहचाना शब्द है जिसका सरल अर्थ है विश्व के विभिन्न क्षेत्रों का एक दुसरे से जुड़ना, समीप आना। जैसे-जैसे परिवहन और संचार के साधनों का उत्तरोत्तर विकास हो रहा है,  दुनिया के विभिन्न कोने एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़ते जा रहे हैं। अर्थात मानव विकास के साथ साथ विश्व का एकीकरण हो रहा है। संसार का हर कोना दूसरे कोनों को, हर देश दूसरे देशों को, और हर महादीप दूसरे महाद्वीपों को समाज-संस्कृति, भाषा-साहित्य और धर्म-दर्शन के सन्दर्भ में प्रभावित और संक्रमित करता रहा है। विश्व के वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म निर्माता जॉन पिल्गर का मानना है कि भुमंडलीकरण पत्रकारों और राजनेताओं द्वारा स्थापित और प्रयुक्त एक शब्द है जो एक वैश्विक गाँव की और संकेत करता है। यह एक अकाट्य सत्य है कि आज पूरी दुनिया एक वैश्विक गाँव बन चुकी हैI

 विश्व के सिमटने की यह प्रक्रिया तभी से चल रही है जब पृथ्वी पर मानव का उद्भव हुआ। जब मनुष्य ने स्थायी जीवन जीना प्रारंभ किया तो इस प्रक्रिया में गति आई। हालाँकि मानव के एक दूसरे से जुड़ने की यह प्रक्रिया बहुत धीमी थी और लघु क्षेत्रों तक ही प्रभावी रही। अतीत में अपनी भाषा और संस्कृति से अलग व्यक्ति को विदेशी की संज्ञा दी जाती थी। परन्तु  धीरे धीरे यह भेद मिटने लगा। यातायात साधनों के विस्तार, आवश्यकताओं में वृद्धि और बढ़ते संचार साधनों ने दुनिया के सिमटने की प्रक्रिया को त्वरित किया । जहाँ तक हमारे भारत का प्रश्न है, यह चिर काल से वैश्वीकरण का प्रेरक और साक्षी दोनों रहा है । भारत ने सदा दुनिया को एक परिवार की तरह देखा है । इस सन्दर्भ में भारत की विचारधारा का एक उदहारण देखिए-
      अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम ।
      उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम ।।

 भूमंडलीकरण ने मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है। समाज और संस्कृति को, भाषा और साहित्य को, धर्म को और अर्थव्यवस्था को। हाँ, यह अवश्य कहना होगा कि देश काल और परिस्थितियों के अनुसार इसका प्रभाव बदलता रहा है ।  भूमंडलीकरण का फल विकसित देशों के लिए कुछ और रहा है तो विकासशील और अविकसित देशों के लिए कुछ और ; अंग्रेजी के लिए कुछ और तो हिंदी के लिए कुछ और; संपन्न लोगों के लिए कुछ और तो विपन्न लोगों के लिए कुछ और।  यह कहीं लाभदायक रहा, कहीं निराशाजनक तो कहीं मिश्रित फलदायी I

  जब यूरोप में पुनर्जागरण आया तो मानव विचार और चिंतन का केंद्र विन्दु बन गया  बीसवीं शताब्दी तक मानव कल्याण की अवधारणा वहां परिपक्व रूप ले चुकी थी । प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब एशियाई देशों के सिपाही यूरोप गए तो उन्होंने यूरोपीय समाज के मानवीय संवेदना और वैचारिक सतह पर मानव-मात्र की प्रधानता को देखा और वापस आ कर अपने देशों में इस विचारधारा का प्रसार किया । यह समाज पर भूमंडलीकरण के सकारात्मक प्रभाव का एक उदहारण है ।

इतिहास में दो कुख्यात बीमारियों की चर्चा है- एक मवेशी रोग रिंडर पेस्ट और दूसरी चेचक I रिंडरपेस्ट को ‘मवेशियों का हैजा’ और ‘युद्ध की बीमारी’ की संज्ञा दी जाती है I यह बीमारी 19वीं शदी में एशिया से अफ्रीका आई I ध्यातव्य है कि अफ़्रीकी लोग अपने यूरोपीय मालिकों के लिए काम करने के लिए तैयार नहीं थे, आकर्षक वेतन पर भी नहीं । वे पशुपालन और पशुचारण पर आधारित अपने जीवन से प्रसन्न थे । पर, जब उक्त संक्रामक बीमारी ने अफ्रीका में प्रवेश किया तो हिन्द महासागर तट से अटलांटिक तट तक अपने रास्ते में आने वाले 90% मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया। वहां के मूल निवासियों की आर्थिक कमर टूट गयी और इस तरह एक मवेशी-रोग ने  अफ्रीकियों को उपनिवेशवादियों का दास बना दिया।

 कुछ ऐसा ही खेल चेचक नाम की बीमारी ने मध्य अमेरिका के माया और एजटेक सभ्यताओं के निवासियों के साथ खेला। अमेरिकियों के लिए चेचक एक नई बीमारी थी जिसकी प्रतिरोधक क्षमता उनके शरीर में नहीं थी। इस बीमारी ने उपरोक्त दोनों सभ्यताओं के निवासियों के लिए कोलंबस के शस्त्रास्त्र का कार्य किया, लाखों मूल निवासी इस संक्रामक रोग से काल-कवलित हो गए और कोलम्बस की विजय-राह आसान हो गयी ।

 भूमंडलीकरण की चर्चा में ‘रेशम मार्ग’ अत्यंत उल्लेखनीय है। यह एक प्राचीन ऐतिहासिक  व्यापार मार्ग था जो पूर्वी एशिया को यूरोप से जोड़ता था। इसने एशिया और यूरोप को आर्थिक सूत्र में बांधने का कार्य कियाI व्यापार में रेशम की अधिकता के आधार पर इस अंतरमहाद्विपीय मार्ग का नामकरण हुआ था। इसका महत्व मार्कोपोलो के समय तक बना रहा।  रेशम मार्ग का केवल आर्थिक महत्व ही नहीं रहा वरन यह सांस्कृतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण था। इतिहास के साक्ष्य बताते हैं कि इस मार्ग का अनुसरण बौद्ध प्रचारकों, इसाई मिशनरियों और मुस्लिम आक्रान्ताओं ने भी कियाI यह मार्ग एशिया में सांस्कृतिक-धार्मिक उथल पुथल और परिवर्तन का सूत्रधार रहा है। रेशम मार्ग कभी बौद्ध धर्म के उत्थान में तो कभी इस्लाम के प्रसार सहायक रहा, साथ ही भूमंडलीकरण का पर्याय भी।

  लिओनार्दो दा विन्ची की मोनालिसा की सम्मोहक स्मित का कायल कौन नहीं! मध्यकालीन इटली से निकल कर इस अप्रतिम पेंटिंग की प्रतिकृतियाँ आधुनिक साज सज्जा का  अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं।
  यह भूमंडलीकरण की ही देन है कि बराक ओबामा दीपावली मनाते तो ट्रम्प वैदिक मंत्रोचार सुनते दिख जाते हैं; रूस की कोई गायिका बिहार की छठ पूजा के गीत गाते सुनी जाती है तो भारतीय युवक युवतियाँ पश्चिमी रैप व टैप नृत्य करते हुए दिख जाते हैं।  सिंजो आबे गंगा आरती के समय प्रणाम की मुद्रा में हाथ जोड़े दिखे थे तो उसे भारत-जापान की सांस्कृतिक निकटता की बानगी माना गया था। कैरिबियाई गंगनम का वैश्विक प्रसार और पूरी दुनिया में सांता क्लॉस की लोकप्रियता भूमंडलीकरण का ही प्रतिफल है।

  ब्रिटेन की अंग्रेजी आज अमेरिकन इंग्लिश, इंडियन इंग्लिश, ऑस्ट्रलियन इंग्लिश आदि कई रूप धारण कर विश्वव्यापिनी हो गई है। अंग्रेजी जहाँ जहाँ गयी, वहां की स्थानीय भाषा के लिए चुनौती बन गई। इसके प्रभाव में कुछ भाषायें लुप्त हो गयीं तो कुछ और सशक्त होकर उभरीं।  तुलसीदास और शेक्सपियर तथा कालिदास और मिल्टन की तुलना का विमर्श भूमंडलीकरण का ही प्रतिफल है। भारत की हिंदी व चीन की मंदारिन बाज़ार के बूते न केवल बलवती हुई हैं बल्कि इनकी अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता बढ़ी है।  ए आर रहमान निर्देशित ‘जय हो’ मुखड़े वाला  एक लोकप्रिय गीत इंग्लैंड पहुँच गयाI  केवल वहां पहुंचा ही नही, ‘जय हो’ ऑक्सफ़ोर्ड के अंग्रेज़ी शब्दकोष में भी घुस गया। यह है भूमंडलीकरण का कमाल।

 हमें यह स्वीकार करना होगा कि  इस भूमंडलीकरण ने अनेक चुनौतियों को जन्म दिया है।  विलग संस्कृतियों का अंधानुकरण और प्रतिभा का पलायन  जैसी कई समस्याएँ इसी की देन हैं। ये चुनौतियाँ अनेक देशों, विशेषकर विकासशील एवं पिछड़े , में विद्यमान हैं।  आतंकवाद आज वैश्विक समस्या बन कर उभरा है। साथ ही भूमंडलीकरण के फलस्वरुप इबोला और जिका जैसे विषाणुओं का प्रसार घातक रूप से बढ़ा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि क्षेत्रीय असंतुलन तथा निर्धनता और सम्पन्नता के बीच बढती खाई को भी वैश्वीकरण ने ही विस्तारित किया है। हमे इन चुनौतियों के समाधान का मार्ग खोजना होगा।

  मानव समुदायों के मिलन से जन्मी सकारात्मक उर्जा नए आविष्कारों, रचनाओं एवं कृतियों का मार्ग प्रशस्त करेगी, हम सभी ईश्वर से यह कामना करें।
                                    - विकास