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Friday, 16 November 2012

मुझको रास आ गया  है तुम्हारा शहर
मेरे दिल में बसा है तुम्हारा शहर
 
कल तक तो हम अजनबी  यहाँ
हम मिले ,  बन गया यह हमारा शहर


हमने मिल के लिखी जो इबारत नई
पढ़ते पढ़ते थका है हमारा शहर

तुम थे यहाँ थी हँसीं वादियाँ
अब उदासी भरा है हमारा शहर

फिर से आ जाओ तुम सुन के मेरी सदा
तेरी राह देखता है हमारा शहर

झिलमिलाती रही 'विकास' की रश्मियाँ
फिर भी पिछड़ा हुआ है हमारा शहर ....

Sunday, 19 February 2012

हर हाथ को जब काम  मिले इंक़लाब हो
प्रतिभा को सम्मान मिले इंक़लाब हो

क्षेत्रवाद और मनमुटाव छोड़ कर 
आपस का वैर और भेदभाव छोड़कर 
जब हिन्दू - मुसलमान मिले इंक़लाब हो

हर घर में यहाँ शिक्षा का प्रसार हो सके
समानता, बंधुत्व  का विस्तार हो सके
खुशहाल, हर किसान  मिले ,इंक़लाब हो



Tuesday, 7 February 2012

मुरझा गए कमल और सिसकता गुलाब है
ये इन्क़लाब  है?
भ्रष्टाचार  का बाज़ार यहाँ बे हिसाब है,
ये इन्कलाब है?

नेता हैं अपने काम का गुणगान कर रहे,
और कर्ज से दबे यहाँ  किसान मर रहे,

मजबूर हैं, अफसरों का बस यही जवाब है 
ये इन्कलाब है?