हिंदी फिल्मों और भारतीय रेल का नाता बहुत पुराना है। इस आलेख में हम इसी संबंध को समझने करने का प्रयास करेंगे। भारतीय रेल यातायात का साधन मात्र नहीं है, यह स्थिरता के अंधकार में गतिशीलता का प्रकाश है, यह भारत की जनता का विश्वास है, भारतीय रेल है तो चतुर्दिक विकास है। हमारी यह रेल जीवन के हर क्षेत्र से गहराई से जुड़ी है - साहित्य से, समाज से, अर्थव्यवस्था से, संगीत से और फिल्मों से भी। इस दृष्टि से हमारा विषय हिंदी फिल्म और भारतीय रेल अति महत्वपूर्ण बन जाता है। यदि फिल्में समाज का दर्पण है तो रेल देश की धड़कन है।
हिंदी फिल्मों और भारतीय रेल ने एक दूसरे को बहुत हद तक प्रभावित किया है। फिल्मों ने भारतीय रेल की सहायता से स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक ताना-बाना, आजीविका कमाने की जद्दोजहद और प्रेम जैसे विषयों का रूपहला विश्लेषण किया है। कुछ फिल्मों ने दुर्घटनाओं की त्रासदी को भी बखूबी चित्रित किया है।
'23 मार्च 1931 शाहिद','द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह' आदि फिल्मों में चंपारण सत्याग्रह, काकोरी कांड, नेताजी की लाहौर यात्रा जैसी घटनाओं को भारतीय रेल की सहायता से बहुत ही जीवंत रूप में पर्दे पर उतरा गया है। पिंजर नाम की फिल्म भारत विभाजन की त्रासदी इस तरह परिभाषित करती है कि दर्शकों की आँखों से झर-झर आँसू गिरते हैं।
फिल्म 1936 की फिल्म 'अछूत कन्या' और 1955 की 'रेलवे प्लेटफार्म' नमक चलचित्रों ने देश की सामाजिक बुनावट को रेल के माध्यम से ही चित्रित किया है। अछूत कन्या फिल्म में प्रताप और कस्तूरी के किरदार क्रमशः अशोक कुमार और देविका रानी ने निभाया है। ब्राह्मण युवक प्रताप और तथाकथित अछूत युवती कस्तूरी की प्रेम कथा का अंत रेल मार्ग पर स्थित एक फाटक के निकट होता है जहाँ कस्तूरी अपने सुहाग और प्रेम दोनों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देती है। 'रेलवे प्लेटफार्म' फ़िल्म में बाढ़ की विभीषिका में फँसी रेलगाड़ी की कथा है। इस चलचित्र में प्रथम श्रेणी कोच में यात्रा कर रही एक राजकुमारी को द्वितीय श्रेणी के एक युवक यात्री में अपना नायक दिखाई देता है। इस फिल्म ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि संकट व त्रासदी झेलने की क्षमता यथाचित्रित द्वितीय श्रेणी के लोगों में अपेक्षाकृत अधिक होती है।
'स्लमडॉग मिलेनियर' फिल्म का जमाल, सलीम और लतिका हम सबको प्रायः याद आते हैं। जमाल और उसका भाई छोटे-मोटे सामान बेचते हुए या छोटी-छोटी चोरियाँ करते हुए उन लाखों ज़िन्दगियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो रेलवे स्टेशनों पर या उसके आसपास फल-फूल और बढ़ रही हैं। फिल्म कुली का एक गीत तो भारतीय रेल का दर्शनशास्त्र बनकर उभरता है। नायक गाता है- "सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं" जैसे यह भारत की रेल स्वयं गा रही हो या कोई रेलवे स्टेशन आलाप लगा रहा हो- "लोग आते हैं लोग जाते हैं हम यहीं पर खड़े रह जाते हैं"।
प्रेम की व्यग्रता, आकुलता और तीव्रता को प्रकट करने के लिए अनेक फिल्मकारों ने रेल की गति का सहारा लिया है। एक लोकप्रिय हिंदी फिल्म का एक दृश्य काफी यादगार है जिसमें रेल में चढ़े नायक राज के पीछे भागते हुए पहुंचती है नायिका सिमरन। प्रेम मिलन का यह दृश्य अमिट प्रभाव छोड़ता है। 'चेन्नई एक्सप्रेस' फिल्म में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच का प्रेम, रेल के एक डिब्बे में ही परवान चढ़ता है। जिस प्रकार यह फिल्म उत्तर और दक्षिण के बीच भाषाई पुल का कार्य करती है ठीक उसी प्रकार भारतीय रेल देश की एकता के सूत्र का कार्य करती है। 'दिल से', 'वीर जारा' 'गदर' आदि अनेक फिल्में हैं जिनमें रेलगाड़ी ने ही प्यार को परिणति तक पहुँचाया है। आराधना फिल्म की रेल की छुक-छुक करती सँकरे रेल मार्ग की गाड़ी और सुमधुर प्रेममय संगीत सभी को याद होगा संभवतः।
कई हिंदी चलचित्रों ने भारतीय रेल को खतरों से आगाह किया है। द बर्निंग ट्रेन एक कालजयी फिल्म है। यह आग के खतरों से रेल को चेताती है। विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डालती यह फिल्म प्रबंधन तंत्र को चेतावनी देती है कि रेल को आग जैसी दुर्घटनाओं से कितनी बड़ी विभीषिका झेलनी पड़ सकती है। शोले और प्लेयर्स जैसी फ़िल्में हमें लुटेरों की चुनौती से सावधान करती हैं। अर्थात, हिंदी फिल्मों में रेल की सुरक्षा और संरक्षा जैसे मुद्दों को न केवल उठाया है बल्कि उनके समाधान खोजने का प्रयास भी किया है।
फिल्मों की शूटिंग रेल के राजस्व अर्जन का एक स्रोत है। पर पिछले वर्षों में रेल के साथ फ़िल्म निर्माण के शुल्क में भारी वृद्धि की गई है। इससे आशंका बनती है कि कहीं फिल्मों और रेल का यह साहचर्य टूट न जाए। हमें इस गठजोड़ को बनाए रखने का प्रयास करना होगा।
अंत में, इस आलेख में यह लेखक तूफान मेल फिल्म के गीत की कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना चाहता है जो जीवन दर्शन को परिभाषित करती हैं।
दुनिया यह दुनिया तूफान मेल!
इसके पहिए जोर से चलते
और अपना रास्ता तय करते।
सयाने इससे काम पे निकलें
बच्चे समझें खेल।
तूफान मेल! तूफान मेल!!
-विकास विदीप्त
