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Friday, 28 July 2023

पर्यावरण की चुनौतियाँ और हम

 चरक संहिता में जनपदोध्वंस नामक एक अध्याय है जिसमें पर्यावरण पर चर्चा की गई है। इस अध्याय का निहितार्थ है कि जिस देश और काल का पर्यावरण प्रदूषित हो गया हो उसका परित्याग कर देना चाहिए क्योंकि उसका विध्वंस सन्निकट होता है। यह उल्लेख करने का  उद्देश्य यह बताना है कि प्रदूषण ही पर्यावरण की सर्वकालिक चुनौती रहा है। यह एक नकारात्मक चुनौती है। साथ ही कुछ संसाधनों और पदार्थों की दुर्लभता तथा जैव प्रजातियों की विलुप्तता भी पर्यावरण की प्रमुख नकारात्मक चुनौतियां हैं। पर्यावरण की कुछ सकारात्मक चुनौतियां भी हमारे समक्ष विद्यमान हैं, जैसे- अधिकाधिक वृक्षारोपण करना, वनों का विध्वंस रोकना, जन जागरूकता में वृद्धि और शिक्षा द्वारा पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना, इत्यादि।

हम पर्यावरण की चुनौतियां के मात्रात्मक पक्ष पर एक दृष्टि डालते हैं- 

1) औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक कार्बन उत्सर्जन द्विगुणित होकर 421 कण प्रति दस लाख तक पहुँच  गया है। इससे वायुमंडलीय ऊष्मीकरण तीव्र हो रहा है। पिछले सौ वर्षो में पृथ्वी की संपूर्ण सतह का तापमान 1 डिग्री फारेनहाइट बढ़ गया है। कार्बन उत्सर्जन ही ओजोन रिक्तिकरण की समस्या के लिए उत्तरदायी है। 

 2) निर्वनीकरण और  औद्योगिक अच्छादन के कारण वन्य जीवों  का प्राकृतिक आवास प्रभावित हुआ है। वनों के आसपास की बस्तियों पर उनके आक्रमण की घटनाओं में वृद्धि हुई है। बिहार के बाल्मीकीनगर बाघ अभयारण्य,  उत्तराखंड के पौड़ी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश के बहराइच क्षेत्र के साथ ही अन्य प्रान्तों से प्रायः ऐसी खबरें आती हैं। वनों  के निकट स्थित कई क्षेत्रों में मांसाहारी जीवों का आक्रमण होने की  खबरें मिलती रहती हैं। 

3) हमारे खान-पान की आदतें अव्यवस्थित और प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध होती जा रही हैं। हमारी अस्त व्यस्त जीवन शैली, साफ सफाई के प्रति हमारी असंवेदनशीलता, सुख सुविधाओं के दासत्व के कारण भी अनेक चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं। चेचक, प्लेग, मलेरिया, टाइफाइड और डेंगी को झेलते हुए हम कोविड के दौर में पहुँच चुके हैं।

4) अंधाधुंध विकास की अंतर्राष्ट्रीय होड़ ने अनेक हानिकारक गैसों और रसायनों के उत्सर्जन को तीव्र किया है जिससे जल और वायु प्रदूषित हो रहे हैं, पेयजल की कमी हो रही है। क्लोरो फ़्लोरो कार्बन, नाईट्रस ऑक्साइड, हाईड्रोजन सल्फाइड आदि ऐसी ही गैसें हैं।

5) 'क्लब ऑफ रोम' का एक प्रपत्र है  जो  1871 से 1971 के बीच पर्यावरण में बदलाव की प्रवृत्ति के विश्लेषण  पर आधारित है । इसमें  कहा गया है कि 2071 तक यह धरती मानव सभ्यता के लिए अनुपयोगी हो  जाएगी। यदि हम अभी से नहीं चेते तो आगे बहुत कठिन समय आने वाला है। हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा। 

 पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए हमें क्रांतिकारी प्रयास करने की आवश्यकता है। इसके प्रति हमारे आवश्यक कर्तव्यों को 4 'स' के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता है- 'समझ', 'सहभागिता', 'सशक्तिकरण' और 'स्वत्व'।

  'समझ' से  तात्पर्य व्यक्ति और समाज में पर्यावरण की समझ को व्यापक बनाने से है। पर्यावरण शिक्षा का प्रसार करके हम इसके प्रति संवेदना में वृद्धि कर सकते हैं।  'सहभागिता' का निहितार्थ है पर्यावरण संरक्षण में जनभागीदारी को बढ़ाना। इसी प्रकार सशक्तिकरण का अर्थ है-  ज्ञान के द्वारा व्यक्ति को और अनुसंधान के द्वारा प्रौद्योगिकी को  इतना सशक्त बनाया जाए कि पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे।  चौथा 'स' स्वत्व को इंगित करता है। हमारे शरीर के पंच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हमारे अंदर के अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोषों को प्रभावित करते हैं। पर्यावरण को शुद्ध रखकर ही हम अपने शरीर के भीतर के  इन कोषों को शुद्ध रख सकते हैं और आत्मा को स्वस्थ रख सकते हैं। अतः हमें  क्षिति, जल, पावक, अनल और समीर को शुद्धतम रूप में रखना ही होगा और इस पर अपना स्वत्व बनाए रखना होगा।  

 हम व्यक्तिगत तौर पर ,दैनिक क्रियाकलापों और सामान्य व्यवहार में  सजगता लाकर पर्यावरण सुरक्षा में अपनी सहभागिता बढ़ा सकते हैं। विद्युत उपकरणो का यथोचित उपयोग, जल की बरबादी को रोकना, अपने परिवार में जल और वायु के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना, पौधे लगाना और दूसरों को इसके लिए प्रेरित करना, आदि कार्य हमें अपनी जीवन शैली में समाहित करने होंगे।

  पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षा के लिए हमने कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं। पृथ्वी सम्मेलन, क्योटो प्रस्ताव, बाली कार्य योजना, जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी कार्यबल आदि के माध्यम से हमने पर्यावरण की अक्षुण्णता को बनाए रखने का प्रयास किया है। हमें व्यक्तिगत तौर पर भी बड़ा प्रयास करना होगा, अपना शत प्रतिशत योगदान देना होगा।।  इस आलेख का समापन विकास विदीप्त की दो पंक्तियों से करना उचित है-

पेड़ बूढ़ा हुआ है तो क्या हो गया

            छाँव इसकी घनी है घनी रहने दो।

छाँटो मत शाखें तुम निर्दयी मत बनो

              जितनी है रोशनी, रोशनी रहने दो।

                   *****                                                            - विकास पाण्डेय