Powered By Blogger

Tuesday, 17 January 2017

दाना मांझी

जर्जर हो गया है , गल गया है।
सड़ गया है सामाजिक तन्त्र।
बदबूदार हो चुकी है यह व्यवस्था।

करुण क्रंदन कर रहे है
गली के कुत्ते
हर एक का मार्ग काट रहीं
काली बिल्लियां ।
किन्तु , आज संवेदनाओं को जगाने का
हर प्रयास निष्फल है।

तुम्हारी बाँहों में
मृत पड़ी है मानवता
या संवेदना या फिर सहानुभूति।

अर्धांगिनी का नही
तुमने कंधे पर रखा है तन्त्र का शव।
चिकित्सा तंत्र का
जनतंत्र का, पुलिस तंत्र का
प्रशासनिक तंत्र का
लोकतान्त्रिक राजे-राजकुमारों का।

पक्षी पशु मेंढक चींटियाँ सब
आतुर हैं सहायता को।
आज तो गिरगिट भी बार - बार
गर्दन घुमा कर देखता है
तुम्हारे चट्टानवत कंधे को।
बस मानवों की भीड़
खड़ी है अकर्मण्य।
मृतकों में नहीं होती कोई संवेदना।

तुम्हारे अश्रु के ताप से
समीपस्थ लताएँ धू - धू कर के
जल जाना चाहती हैं
पुष्प बिखर जाना चाहते हैं
तुम्हारे पग में।

तुम तो मांझी हो पार उतारने वाले हो
पर, तुम्हारी नाव कौन खेवेगा।
गरीब को करनी पड़ती
एक कंधे वाली शव यात्रा।

ओह्ह!सत्तर वर्षीया भारत माँ के
आंसू बह रहे हैं, तुम्हारी
बारह वर्षीया पुत्री की आँखों से ।

        (Vkp)

सैन्टा क्लॉज़

हे सैंटा!
एक बार आना मेरे घर भी।

ले आना एक ऐसी साड़ी
जिसमें मेरी माँ लगे और सुन्दर ।
पापा के लिए ले आना नए जूते
या उनके पुराने जूतों को
कर देना नया अपने जादू से।

हमारे कम्बल को कर देना
थोड़ा और बड़ा
बना देना थोड़ा और गर्म
जिसमें छुप जाने पर सुनाई न दे
कुत्तों का रोना और नही लगे ठंढ ।

दीदी के लिए नई किताबें लाना
अपनी छोटी फ़ोटो चिपका कर ।
जिसपर दीदी लिखेगी अपना नाम
और पढ़ेगी जोर जोर से बोलकर
बड़े साहेब की बेटी की तरह।

मेरे लिए ले आना
एक पूरी बाँह का स्वेटर
भले मत लाना बिस्कुट या टॉफियां।
लेकिन !
क्या तुम मेरे घर आ सकते हो ?

कालिख

हाँ ! मैं कालिख हूँ लेकिन,

मुझे केवल कालिख मत समझना ।
 मैं ही हूँ कि जब आँखों में लगती हूँ
तो काजल बन जाती हूँ,
मुझ में  छिपा है आकर्षण और प्रेम ।

मुझे केवल कालिख मत समझना
मैं कागज पर उतरतीहूँ
तो बन जाती हूँ
अक्षर,   शब्द   और  संदेश
मुझ में छिपी है क्रांति।
                    (Vkp)

धीरे धीरे मरना

ब्राजील की पुर्तगाली भाषा की पत्रकार कवयित्री  मार्था मेदिरोस  की एक कविता इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब घूम  रही है । परेशानी यह है कि यह पाब्लो नेरुदा की रचना बताई जा रही है जबकि नेरुदा फाउंडेशन भी भूल सुधार करने की अपील कर चुका है । परेशानी यह कि मूल रचना से अंग्रेजी, फिर अंग्रेजी से हिंदी में रूपांतरित और सोशल मीडिया पर भारत में वायरल हुई इस कविता के हिंदी रूपांतर में बहुत कुछ छूट गया था । मैंने एक लघु प्रयास किया है यदि अच्छा लगे तो प्रोत्साहन जरूर दें  ।
 हाँ , आप इसे व्हाट्सएप्प पर भी शेयर कर सकते हैं ।

   “ वह धीरे धीरे मरने लगता है ”
                     -  मार्था मेदिरोस
                      अनुवाद- विकास पाण्डेय

वह, जो बन जाता है दास अपनी आदतों का
जो जीता रहता है एक ही दिनचर्या,
जो  बदलता नही अपनी रफ़्तार
जो उठाता नही जोखिम ,
जो परिवर्तित नही करता अपने वस्त्रों के रंग
जो नही करता बात अपरिचितों से
वह धीरे धीरे मरने लगता है l

वह स्त्री या वह पुरुष, जो दूर हट जाता है अपने जूनून से
और जो भावनाओं की गर्मजोशी से अधिक,
स्वत्व को महत्व देता है
ऐसी भावनाएं,
जो वापस ला सकती हैं किसी की आँखों को चमक
उबासी को मुस्कान में बदल सकती हैं,
जोड़ सकती हैं चकनाचूर हुए ह्रदय को l
जिसे श्वेत से अधिक स्याह पसंद है
वह धीरे धीरे मरने लगता है l

वह, जो नही रखता कभी भी चीजों को अस्त व्यस्त
जो असंतुष्ट रहता है अपने कार्य से
अपने किसी स्वप्न का पीछा करते हुए जो नही लेता जोखिम
अनिश्चित के लिए निश्चित को छोड़ने का
जो जीवन में कम से कम एक बार
अवहेलना नही करता किसी उचित सलाह की
वह धीरे धीरे मरने लगता है l

जो करता नही यात्रा, जो कुछ पढता नही है
जो नही सुन पाता संगीत
वह स्त्री जो नही पाती खुद में कोई लावण्य
वह पुरुष जो नही देख पाता स्वयं में आकर्षण
वह धीरे धीरे मरने लगता है l

वह, जिसने नष्ट कर लिया है आत्मसम्मान
जो नही करने देता किसीको अपनी सहायता
जो अविरल वृष्टि को अपना दुर्भाग्य मान कर
बिता देता है पूरा दिन l
वह धीरे धीरे मरने लगता है l

वह स्त्री या पुरुष
जो छोड़ देता है कोई कार्य उसे प्रारंभ करने के पूर्व ही
जो अज्ञानता मिटाने के लिए प्रश्न नही पूछ पाता l
वह स्त्री या पुरुष
जो पूछने पर भी नही देता जवाब
जो उसे निश्चय ही ज्ञात है l
वह धीरे धीरे मरने लगता है l

आइये हम किश्तों में आनेवाली मृत्यु को दूर भगाएं
यह याद दिला कर, कि जीवित रहने के लिए
सामान्यतः सांस लेते रहने की अपेक्षा
कही वृहत्तर प्रयास आवश्यक है l

केवल प्रबल धैर्य से होगी
भव्य हर्ष की उपलब्धि l
- मार्था मेदिरोस