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Wednesday, 28 March 2018

इन्क़लाब

सियासत को मेरा इक पैगाम दे दो

इन्कालाबियों  में  मेरा  नाम दे  दो।


बस भी  करो  मुझको  खैरात  देना

बेजा इन  हाथों को  तुम काम दे दो।


अब  मेरी बस्ती में  मत बाँटो रुपये

अमन की सुबह खुशनुमा शाम दे दो।


नही  चाहिए  मुझको  हीरे  जवाहर

पसीने  का  मेरे  वाज़िब  दाम  दे दो।


मजहब  से  तुमने  बहुत खेल  खेले

इस फसाद को आख़िरी मुक़ाम दे दो।


बहुत हो चुके हैं यासिन और  गिलानी

फिर एक हमीद और  एक कलाम दे दो।


अमन  भाईचारा और  ईद ओ  दीवाली

मुल्क के लोगों को खुशियाँ तमाम दे दो।

                              (Vkp)

सियासी रंग

हर चौक चौराहे  को   सजा दिया गया
झंडा सियासी ताव से  लगा दिया गया ।

सभा में आज भीड़ का रिकॉर्ड बन गया
गलीचा गुलाबी नोट का बिछा दिया गया।

जनाब  शपथ लेने को   आये हैं  जेल से
हर गुनाह उनका वोट से धुला दिया गया।

सेहत  पे असर ना हो  खराब  इसलिए
पानी  ज़रा  शराब में  मिला दिया गया।

हमीं हैं  रहनुमा और  हमीं हैं  सिकन्दर
जनता को साफ साफ यह बता दिया गया।

टीवी में और अखबार में हमारी सुर्खियां
हर  खबरनवीस  को पटा  लिया  गया ।

हमारे  शहंशाह  का विरोध  है  कहाँ
जो भी खड़ा हुआ उसे गिरा दिया गया।
                              (Vkp)