सियासत को मेरा इक पैगाम दे दो
इन्कालाबियों में मेरा नाम दे दो।
बस भी करो मुझको खैरात देना
बेजा इन हाथों को तुम काम दे दो।
अब मेरी बस्ती में मत बाँटो रुपये
अमन की सुबह खुशनुमा शाम दे दो।
नही चाहिए मुझको हीरे जवाहर
पसीने का मेरे वाज़िब दाम दे दो।
मजहब से तुमने बहुत खेल खेले
इस फसाद को आख़िरी मुक़ाम दे दो।
बहुत हो चुके हैं यासिन और गिलानी
फिर एक हमीद और एक कलाम दे दो।
अमन भाईचारा और ईद ओ दीवाली
मुल्क के लोगों को खुशियाँ तमाम दे दो।
(Vkp)
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